Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi – उत्तक (Tissue) में आपको इस अध्याय से जुड़े महत्वपूर्ण Topics और Concepts एक ही जगह पर मिलेंगे। ये Notes NCERT पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं और CBSE, Bihar Board, UP Board तथा अन्य State Boards के Hindi Medium विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हैं। इन Notes के माध्यम से विद्यार्थी Chapter के जरूरी हिस्सों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
इस Chapter में पादप ऊतक (Plant Tissue) और जंतु ऊतक (Animal Tissue) दोनों का अध्ययन शामिल किया गया है। पादप ऊतकों में विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue) और स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) के साथ मृदूतक (Parenchyma), स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma), दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma), जटिल ऊतक (Complex Tissue), जाइलम (Xylem), फ्लोएम (Phloem) तथा विशिष्ट ऊतकों के बारे में जानकारी दी गई है। इनके साथ उनकी संरचना, स्थान और कार्य को भी समझाया गया है।
जंतु ऊतकों के अंतर्गत एपिथीलियम (Epithelial Tissue), संयोजी ऊतक (Connective Tissue), पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) और तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) को शामिल किया गया है। इसके अलावा स्नायु, कण्डरा, अस्थि, उपास्थि, रक्त और लसीका जैसे संयोजी ऊतकों के बारे में भी जरूरी जानकारी दी गई है। रक्त के RBC, WBC और Platelets के कार्य तथा तंत्रिका कोशिका के साइटन, डेंड्राइट, एक्सॉन और माइलिन शीथ जैसे प्रमुख भागों को भी समझाया गया है।
इन Notes में विभज्योतक ऊतक के प्रकार – शीर्षस्थ, पार्श्व और अंतर्वेशी, स्थायी ऊतक के प्रमुख प्रकार, Xylem और Phloem के घटक एवं उनके कार्य, तथा पादप और जंतु ऊतकों के बीच अंतर को भी शामिल किया गया है। महत्वपूर्ण जानकारी को तालिकाओं, मुख्य बिंदुओं और तुलना के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जिससे Revision के समय जरूरी बातें दोहराना आसान हो।
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Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi

| Board | Bihar School Examination Board (BSEB) |
|---|---|
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 9th |
| Subject | Science (Biology) |
| Chapter No. | Chapter 2 |
| Chapter Name | उत्तक (Tissue) |
| Category | Class 9th Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
ऊतक (Tissue) किसे कहते हैं ?
उत्पत्ति और बनावट (Origin and Structure) के आधार पर समान प्रकृति वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक (Tissue) कहा जाता है। जब एक जैसी कोशिकाएँ मिलकर किसी विशेष कार्य को करती हैं, तब वे एक ऊतक का निर्माण करती हैं।
ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:
- पादप ऊतक (Plant Tissues)
- जंतु ऊतक (Animal Tissues)
भाग 1: पादप ऊतक (Plant Tissues)
पौधों में उपस्थित सभी ऊतकों को पादप ऊतक कहा जाता है। ये ऊतक पौधों के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं और वृद्धि, सहारा, जल-परिवहन तथा भोजन-परिवहन जैसी प्रक्रियाओं में सहायता करते हैं।
पादप ऊतक दो मुख्य वर्गों में विभाजित होते हैं:
- विभज्योतक (Meristematic Tissue)
- स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)
1. विभज्योतक (Meristematic Tissue) किसे कहते हैं ?
जो पादप ऊतक पौधों के वृद्धि क्षेत्रों (Growing regions) में पाए जाते हैं और जहाँ लगातार विभाजन के द्वारा वृद्धि और विकास होता है, उसे विभज्योतक कहते हैं। इन कोशिकाओं में सक्रिय विभाजन क्षमता होती है।
विभज्योतक का कार्य:
- इस ऊतक की कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं।
- पौधों की लंबाई तथा मोटाई में वृद्धि करवाती हैं।
- नए अंगों के निर्माण में सहायता करती हैं।
विभज्योतक को दो आधारों पर वर्गीकृत किया गया है:
- उत्पत्ति के आधार पर (Based on Origin)
- स्थिति के आधार पर (Based on Position)
(a) उत्पत्ति के आधार पर विभज्योतक के प्रकार
i. प्राथमिक विभज्योतक (Primary Meristematic Tissue)
यह ऊतक पौधों के फूलों/जनन अंगों में नहीं, बल्कि पौधों के भ्रूण (embryo) से सीधे उत्पन्न होता है और शुरू से ही शीर्षस्थ भागों (जड़ व तने के अग्र भाग) में पाया जाता है। इसी के कारण पौधे की लंबाई में वृद्धि (प्राथमिक वृद्धि) होती है।
जो विभज्योतक पौधे के भ्रूणीय ऊतक से सीधे बनता है और शुरू से ही शीर्षस्थ (apical) व अंतर्वेशी (intercalary) क्षेत्रों में सक्रिय रहता है, उसे प्राथमिक विभज्योतक कहते हैं। यह पौधे की प्राथमिक वृद्धि (लंबाई में वृद्धि) के लिए उत्तरदायी होता है।
ii. द्वितीयक विभज्योतक (Secondary Meristematic Tissue)
यह पौधे के जीवन में बाद में बनता है – यह उन स्थायी (differentiated) कोशिकाओं से बनता है जो दोबारा विभाजन की क्षमता प्राप्त कर लेती हैं (जैसे कैंबियम)।
जो विभज्योतक पौधे के जीवन में बाद में, स्थायी ऊतक की कोशिकाओं के पुनः विभाजनक्षम बनने से उत्पन्न होता है और तनों-जड़ों में पार्श्व (lateral) दिशा में स्थित रहता है, उसे द्वितीयक विभज्योतक कहते हैं। यह पौधे की द्वितीयक वृद्धि (मोटाई में वृद्धि) के लिए उत्तरदायी होता है। उदाहरण – कैंबियम (Cambium)।
(b) स्थिति के आधार पर विभज्योतक के प्रकार
स्थिति के आधार पर विभज्योतक तीन प्रकार के होते हैं:
i. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem)
- यह पौधों के शीर्ष भाग, जैसे – कोमल पोंगियाँ (shoot tip) तथा जड़ों के अग्र भाग (root tip) में पाया जाता है।
- इसके कारण पौधों की लंबाई में वृद्धि होती है।
ii. पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem)
- यह विभज्योतक पौधों के तनों और जड़ों में (पार्श्व दिशा में) पाया जाता है।
- इसके कारण पौधों की मोटाई (Secondary Growth) में वृद्धि होती है।
iii. अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem)
- यह विभज्योतक पौधों की पत्तियों के वृन्तों, गाँठों (Nodes) तथा अंतर-गाँठों (Internodes) के पास पाया जाता है।
- इसके कारण नई टहनियों का निर्माण तथा लंबाई में तीव्र वृद्धि होती है।
2. स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) किसे कहते हैं ?
वे पादप ऊतक जिनमें कोशिकाओं का विभाजन बंद हो जाता है तथा जिनमें वृद्धि और विकास नहीं होता, उन्हें स्थायी ऊतक कहा जाता है। ये ऊतक पौधों के तनों, पत्तियों, जड़ों तथा अन्य अंगों में पाए जाते हैं और विभिन्न कार्यों के लिए विशेषीकृत होते हैं।
उत्पत्ति और विकास के आधार पर स्थायी ऊतकों के प्रकार
1. प्राथमिक स्थायी ऊतक (Primary Permanent Tissue) जिस स्थायी ऊतक का निर्माण शीर्षस्थ (Apical) और अंतर्वेशी (Intercalary) विभज्योतक से होता है, उसे प्राथमिक स्थायी ऊतक कहते हैं।
2. द्वितीयक स्थायी ऊतक (Secondary Permanent Tissue) जिस स्थायी ऊतक का निर्माण पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem) अथवा कैंबियम (Cambium) ऊतक से होता है, उसे द्वितीयक स्थायी ऊतक कहा जाता है।
संरचना के आधार पर स्थायी ऊतकों के तीन प्रकार
- सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
- जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)
- विशिष्ट स्थायी ऊतक (Specialized Permanent Tissue)
1. सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
एक समान प्रकार की स्थायी कोशिकाओं से बना वह ऊतक, जिनकी कोशिका भित्ति की मोटाई निश्चित नहीं होती, सरल स्थायी ऊतक कहलाता है। इसमें सभी कोशिकाओं का कार्य लगभग समान होता है।
यह तीन प्रकार का होता है:
A. मृदूतक (Parenchyma) किसे कहते हैं ? पतली कोशिका भित्ति वाली कोशिकाओं के समूह से बना वह स्थायी ऊतक जो पौधों के कोमल भागों (तना, जड़, पत्ती, फल, बीज के एंडोस्पर्म) में पाया जाता है, मृदूतक कहलाता है।
- यदि मृदूतक की कोशिकाओं में हरित लवक (Chloroplast) उपस्थित हो, तो इसे क्लोरोपारेंकाइमा (Chlorenchyma) कहते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण में मदद करता है।
- जब यह जलीय पौधों में पाया जाए और इसकी कोशिकाओं में वायु कोष्ठ (Air cavities) मौजूद हों, तब इसे ऐरेन्काइमा (Aerenchyma) कहते हैं, जो पौधे को तैरने में सहायता प्रदान करता है।
B. स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) किसे कहते हैं ? जब मृदूतक की कोशिकाओं के कोणीय (कोनों वाले) भागों पर सेल्यूलोज का जमाव (Cellulose deposition) हो जाता है, तो यह रचना स्थूलकोण ऊतक कहलाती है।
- यह मुख्यतः पत्तियों के वृन्त (Petiole) व तनों की बाह्य त्वचा (Epidermis) के नीचे पाया जाता है।
- यह पौधों को लचीलापन (Flexibility) व यांत्रिक मजबूती (Mechanical strength) देता है, जिससे पौधे हल्की हवा में झुकते तो हैं, लेकिन टूटते नहीं।
C. दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) किसे कहते हैं ? लंबी-लंबी कोशिकाओं से बना वह ऊतक, जिसकी बाहरी दीवारें अत्यधिक मोटी और कठोर होती हैं तथा जिसमें भीतरी गुहा (लुमेन) अपेक्षाकृत बहुत पतली/संकरी होती है, दृढ़ ऊतक कहलाता है। यह पौधों को कठोरता, मजबूती व लचीलापन प्रदान करता है और पौधों के परिपक्व (Mature) भागों में पाया जाता है।
दृढ़ ऊतक दो प्रकार के होते हैं:
- दृढ़ ऊतक तंतु (Fibres): ये मुख्यतः पौधों के तनों की बाहरी त्वचा (Epidermis) के नीचे रेशों के रूप में पाए जाते हैं (विशेषकर एकबीजपत्री पौधों में प्रचुरता से)। ये तंतु तने को टूटने से बचाते हैं और अतिरिक्त मजबूती देते हैं। उदाहरण: जूट, पटसन, सन (Sunn Hemp), फ्लैक्स।
- स्लेरेड्स या स्टोन सेल्स (Sclereids): ऐसा दृढ़ ऊतक जो अनियमित आकार वाली कोशिकाओं से बना हो और संबंधित अंगों को अत्यधिक कठोरता प्रदान करे। उदाहरण: मूंगफली का छिलका, आम की गुठली, काबुली बादाम का छिलका — इनकी कठोरता स्टोन सेल्स के कारण ही होती है।
2. जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue) किसे कहते हैं ?
जो स्थायी ऊतक अनेक प्रकार की जीवित तथा मृत कोशिकाओं के मिलने से बने हों, उन्हें जटिल स्थायी ऊतक कहा जाता है। इनका मुख्य कार्य पौधों में पदार्थों का परिवहन (Conduction) करना है।
पौधों में पाया जाने वाला संवहन ऊतक (Conductive tissue):
- जाइलम (Xylem)
- फ्लोएम (Phloem)
i. जाइलम (Xylem) किसे कहते हैं ?
वैसा संवहन ऊतक जो पौधों की जड़ों से लेकर पत्तियों तक फैला रहता है और जल तथा खनिज लवणों को नीचे से ऊपर की दिशा में पहुँचाता है, जाइलम कहलाता है।
जाइलम ऊतक चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है:
| कोशिका | विशेषता |
| ट्रैकिड्स (Tracheids) | मृत, लंबी, नलिकाकार कोशिकाएँ; दीवारें मोटी व लिग्निनयुक्त; जल को ऊपर प्रवाहित करती हैं |
| जाइलम नलिका (Vessels) | ट्रैकिड्स से चौड़ी, बेलनाकार, दोनों सिरे खुले; जल के तीव्र संचरण में सबसे सक्षम |
| जाइलम तंतु (Xylem Fibres) | दृढ़ ऊतक से बने, संपूर्ण जाइलम प्रणाली को मजबूती व सहारा देते हैं |
| जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma) | जीवित, पतली भित्ति वाली; जल संवहन में सहायक व भोजन का संग्रह करती है |
ii. फ्लोएम (Phloem) किसे कहते हैं ?
फ्लोएम वह संवहन ऊतक है जो पौधों में तैयार भोजन (प्रकाश-संश्लेषण से बना) तथा अन्य कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थों का परिवहन करता है। यह पदार्थों को ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर — दोनों दिशाओं में ले जाने में सक्षम होता है।
फ्लोएम ऊतक चार भागों से मिलकर बना होता है:
| भाग | विशेषता |
| चालनी नलिका (Sieve Tube) | लंबी, बेलनाकार नलिका; सिरों पर छिद्रयुक्त प्लेट (चालनी पट/Sieve Plate) होती है, जिससे भोजन एक कोशिका से दूसरी में जाता है |
| सखी कोशिका (Companion Cell) | पतली भित्ति वाली मृदूतक कोशिका; चालनी नलिका से जुड़ी रहकर उसके भोजन-परिवहन को ऊर्जा (ATP) देकर नियंत्रित करती है |
| फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma) | पतली भित्ति वाली; भोजन के परिवहन व संग्रह में सहायक |
| फ्लोएम तंतु (Phloem Fibres) | दृढ़ ऊतक तंतुओं से बने; फ्लोएम को मजबूती व सहारा देते हैं — फ्लोएम का यही एकमात्र भाग मृत होता है, बाकी सभी भाग जीवित रहते हैं |
3. विशिष्ट स्थायी ऊतक (Specialized Permanent Tissue) किसे कहते हैं ?
कुछ पौधों में ऐसे ऊतक पाए जाते हैं जो विशेष प्रकार के रासायनिक पदार्थों का स्राव (Secretion) करते हैं। इन्हें विशिष्ट स्थायी ऊतक कहा जाता है। ये दो प्रकार के होते हैं:
i. लेटीसिफ़ेरस ऊतक (Laticiferous Tissue) रबड़ जैसे पौधों (उदा. — रबर प्लांट) में उजले रंग का गाढ़ा द्रव्य, जिसे लेटेक्स (Latex) कहते हैं, बनता है। लेटेक्स का स्राव करने वाले ऊतकों को लेटीसिफ़ेरस ऊतक कहा जाता है। यह पौधों में सुरक्षा तथा घाव भरने जैसी प्रक्रियाओं में भी सहायक होता है।
ii. ग्रंथिल ऊतक (Glandular Tissue) वे पौधों के ऊतक जो तेल, रेज़िन, सुगंधित द्रव्य (Essential Oils) या अन्य विशेष प्रकार के स्राव बनाते हैं, ग्रंथिल ऊतक कहलाते हैं। ये पत्तियों, तनों या फूलों में पाए जा सकते हैं और पौधों में रक्षा व आकर्षण (परागण) में सहायता करते हैं।
भाग 2: जंतु ऊतक (Animal Tissues)
जंतुओं में एक समान प्रकार की कोशिकाओं के समूह से बने ऊतकों को जंतु ऊतक कहा जाता है। ये ऊतक शरीर में संरक्षण, संचरण, नियंत्रण, गति, स्राव, अवशोषण जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।
जंतु ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं:
- एपिथीलियम ऊतक (Epithelial Tissue)
- संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
- पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
- तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)
1. एपिथीलियम ऊतक (Epithelial Tissue) किसे कहते हैं ?
जो जंतु ऊतक शरीर के बाहरी तथा आंतरिक अंगों की रक्षा के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण (Protective covering) बनाते हैं, उन्हें एपिथीलियम ऊतक कहते हैं। यह आहार नाल, फेफड़ों, हृदय, मुख-गुहा तथा विभिन्न नलिकाओं की भीतरी सतह पर पाया जाता है।
कार्य:
- यह ऊतक शरीर को जीवाणुओं, रासायनिक पदार्थों, विकिरणों तथा अन्य हानिकारक पदार्थों से बचाता है।
- इसमें उपस्थित ग्रंथियाँ पाचक रस, दूध आदि विशिष्ट पदार्थों का स्राव करती हैं।
- यह उत्सर्जन नलिकाओं में पाया जाता है और उत्सर्जन क्रिया को संभव बनाता है।
- इसकी कोशिकाएँ तंत्रिका आवेगों को ग्रहण कर सकती हैं, जिससे संवेदना प्राप्त होती है।
- जननांगों में उपस्थित कुछ एपिथीलियम ऊतक युग्मक निर्माण में सहायता करते हैं।
एपिथीलियम ऊतक के प्रकार (मुख्यतः सात प्रकार):
A. शल्की एपिथीलियम (Squamous Epithelium) चपटी, प्लेट जैसी, षट्भुजी कोशिकाओं से बना। फेफड़ों की आंतरिक दीवारों, वृक्क नलिकाओं के बोमैन कैप्सूल, आंतरिक कान की झिल्ली, रक्त वाहिनियों की भीतरी दीवारों तथा मुख गुहा में पाया जाता है। कार्य: आंतरिक अंगों को सुरक्षा; विसरण (Diffusion) क्रिया में सहायता।
B. घनाकार एपिथीलियम (Cuboidal Epithelium) घनाकार कोशिकाओं से बना, मुख्यतः गुर्दे और लार ग्रंथियों में पाया जाता है। कार्य: पदार्थों का स्राव (Secretion), अवशोषण (Absorption), संबंधित अंगों को सहारा।
C. स्तम्भी एपिथीलियम (Columnar Epithelium) लंबी, खंभे जैसी कोशिकाओं से बना। छोटी आंत की आंतरिक दीवार पर पाया जाता है (कोशिकाओं की ऊपरी सतह पर माइक्रोविल्ली), साथ ही गला, आमाशय, आंत तथा मादा प्राणियों की अंडवाहिनियों में भी।
D. पक्षमल एपिथीलियम (Ciliated Epithelium) घनाकार और स्तंभाकार एपिथीलियम के रूपांतरण से बनता है; कोशिकाओं पर पक्ष्म (Cilia) होते हैं, जो पदार्थों को एक दिशा में ले जाने में सहायता करते हैं। नाक की आंतरिक दीवारों, ट्रेकिया (श्वासनली), अंडवाहिनी तथा मेंढक के मुख गुहा में पाया जाता है।
E. ग्रंथिल एपिथीलियम (Glandular Epithelium) स्तंभाकार एपिथीलियम का रूपांतरित रूप, जो विशिष्ट रासायनिक पदार्थों का स्राव करता है। उदाहरण: स्वेद ग्रंथि, सिबेसियस (Sebaceous) ग्रंथि, लार ग्रंथि।
F. संवेदी एपिथीलियम (Sensory Epithelium) स्तंभाकार एपिथीलियम का ही परिवर्तित रूप; संवेदी कोशिकाओं में पाया जाता है। उदाहरण: जीभ की स्वाद कलिकाएँ, कान की आंतरिक झिल्ली, नाक की घ्राण कलिकाएँ (Olfactory Lobes)।
G. स्तरित एपिथीलियम (Stratified Epithelium) कोशिकाओं की कई परतों से मिलकर बना। मुख्यतः त्वचा में पाया जाता है और शरीर को घर्षण, चोट तथा संक्रमणों से बचाता है।
2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue) किसे कहते हैं ?
वैसा जंतु ऊतक जो शरीर के विभिन्न अंगों, ऊतकों और संरचनाओं को जोड़ने, सहारा देने और सुरक्षित रखने का कार्य करता है, संयोजी ऊतक कहलाता है। इस ऊतक में मैट्रिक्स अधिक मात्रा में होता है, जो इसे मजबूती और लचीलापन प्रदान करता है।
कार्य:
- शरीर के अंगों और संरचनाओं को जोड़ता है।
- अंगों तथा अन्य ऊतकों के चारों ओर रक्षात्मक आवरण बनाता है।
- शरीर को सूक्ष्मजीवों के संक्रमण से बचाता है।
- घायल तथा अनावश्यक ऊतकों को हटाने में सहायता करता है।
- शरीर में कंकाल की रचना करता है और शरीर को आकार देता है।
संयोजी ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं:
A. वास्तविक संयोजी ऊतक (True/Areolar Connective Tissue) — इसे पाँच भागों में बाँटा गया है:
a. अंतरालीय संयोजी ऊतक (Areolar Tissue) शरीर के अधिकांश भागों में पाया जाता है। इसमें चार प्रकार की कोशिकाएँ — फाइब्रोब्लास्ट, मैक्रोफेज, मास्ट कोशिका, लिम्फ कोशिका — तथा दो प्रकार के तंतु — कोलेजन तंतु, इलास्टिन तंतु पाए जाते हैं। यह अंगों को ढकने, सहारा देने और उन्हें जगह पर बनाए रखने में मदद करता है।
b. पीत लचीले ऊतक (Yellow Elastic Tissue) पीले एवं अत्यंत लचीले तंतुओं से बना। मुख्यतः धमनियों की दीवारों, ब्रांकिओल्स, कंकाल के पास पाया जाता है। कार्य — त्वचा को नीचे स्थित मांसपेशियों से जोड़ना तथा लचीलापन प्रदान करना।
c. श्वेत तंतुवत ऊतक (White Fibrous Tissue) कोलेजन तंतुओं के सघन समूह से बनता है। कार्य — मांसपेशियों को हड्डियों से मजबूती से जोड़ना। यह रीढ़ रज्जु (Spinal cord) व मस्तिष्क की ड्यूरा मैटर परत में भी पाया जाता है।
d. एडिपोज या वसीय ऊतक (Adipose Tissue) शरीर के गहरे भागों, अस्थि मज्जा और आंतरिक अंगों के आसपास पाया जाता है। इसमें मौजूद वसा कण (Fat globules) शरीर को ठंड से बचाते हैं, ऊर्जा का भंडार बनाते हैं, आंतरिक अंगों को गद्दी प्रदान करते हैं।
e. जालिकावत ऊतक (Reticular Tissue) तारों जैसे आकार वाली कोशिकाओं से मिलकर बना; कोशिकाओं के कोनों से जीवद्रव्य के प्रवर्ध (Processes) निकलकर जाल (Network) बनाते हैं। यह प्लीहा (Spleen), अस्थि मज्जा, यकृत (Liver) में पाया जाता है और सहारा व रक्षा का कार्य करता है।
B. कंकाल ऊतक (Skeletal Tissue)
वह संयोजी ऊतक जो शरीर को निश्चित आकृति और संरचना प्रदान करता है, कंकाल ऊतक कहलाता है। यह शरीर को सहारा देता है और गति में मदद करता है।
कार्य:
- शरीर को निश्चित आकार व संरचना देना।
- कोमल अंगों (मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े) को सुरक्षित रखना।
- शरीर की गति (Movement) में सहायता करना।
कंकाल ऊतक दो प्रकार के होते हैं:
| अस्थि (Bone) | उपास्थि (Cartilage) | |
| कठोरता | अत्यधिक कठोर व मजबूत (कैल्शियम, मैग्नीशियम लवण के कारण) | अस्थि से मुलायम व अधिक लचीला |
| मैट्रिक्स | अकार्बनिक लवण; अपारगम्य | कॉनड्रिन (Chondrin) प्रोटीन; पोषक तत्वों व ऑक्सीजन के लिए पारगम्य |
| कोशिकाएँ | ऑस्टियोसाइट (एकल अवस्था में) | कंड्रोसाइट्स (समूहों में) |
| अन्य विशेषता | कैनालिकुली (पतली नलिकाएँ), आंतरिक गुहा में अस्थि-मज्जा (वसा व रक्त-कोशिकाएँ) | रक्त आपूर्ति नहीं होती, इसलिए धीरे-धीरे ठीक होता है |
| कहाँ पाया जाता है | कंकाल तंत्र | हड्डियों के जोड़, नाक, कान, ट्रेकिया |
C. स्नायु और कण्डरा (Ligament and Tendon) तंतुवत संयोजी ऊतक, जो अत्यंत लचीला तथा मजबूत होता है।
- स्नायु (Ligament): एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ता है।
- कण्डरा (Tendon): मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ने का कार्य करता है।
दोनों ही ऊतक शरीर में गति और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
D. तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue)
इसे परिवहन ऊतक (Transport Tissue) भी कहा जाता है, क्योंकि यह शरीर में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक पदार्थ, विटामिन, हार्मोन आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। रक्त और लसीका (Lymph) मिलकर तरल संयोजी ऊतक बनाते हैं।
रक्त (Blood) क्या है ? जो तरल संयोजी ऊतक प्लाज्मा तथा रक्त-कोशिकाओं से मिलकर बनता है, वह रक्त कहलाता है। रक्त में तीन प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं:
| कोशिका | विशेषता / कार्य |
| लाल रक्त कोशिका (RBC / Erythrocyte) | अकेले में पीले रंग की, किंतु हीमोग्लोबिन रंजक के कारण समूह में लाल दिखाई देती हैं; ऑक्सीजन, पोषक पदार्थ, विटामिन, हार्मोन तथा कुछ मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन करती हैं |
| श्वेत रक्त कोशिका (WBC / Leukocyte) | रंगहीन, अनियमित आकार; शरीर को जीवाणुओं व संक्रामक रोगों से बचाती है |
| बिम्बाणु (Platelets / Thrombocyte) | तुर्क (Disc-like) आकार, संख्या कम; रक्त का थक्का जमाना (Blood Clotting); कमी होने पर घाव का रक्त नहीं रुकता |
लसीका या लिम्फ (Lymph) किसे कहते हैं ? यह रंगहीन तरल संयोजी ऊतक है, जिसमें प्रोटीन, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लिंफोसाइट, फागोसाइट जैसी कोशिकाएँ पाई जाती हैं। यह पूरे शरीर में लसीका तंत्र (Lymphatic System) द्वारा प्रवाहित होती है।
कार्य:
- शरीर में विभिन्न पदार्थों के परिवहन में सहायक।
- वसा के परिवहन में मदद करता है।
- शरीर को संक्रामक रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
3. पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) किसे कहते हैं ?
जंतु ऊतक जिनमें संकुचनशील रेशे पाए जाते हैं और जिनमें मैट्रिक्स अनुपस्थित रहता है, उन्हें पेशीय ऊतक कहा जाता है। इन रेशों में उपस्थित संकुचनशील जीवद्रव्य को सार्कोप्लाज्म (Sarcoplasm) कहते हैं, जो एक झिल्ली से घिरा रहता है जिसे सरकोलिमा (Sarcolemma) कहते हैं।
कार्य के आधार पर पेशीय ऊतक के प्रकार:
- ऐच्छिक पेशी (Voluntary Muscle): जिन पेशियों के कार्य पर मस्तिष्क का नियंत्रण होता है। उदाहरण — हाथ और पैर की पेशियाँ।
- अनैच्छिक पेशी (Involuntary Muscle): जिन पेशियों पर मस्तिष्क का नियंत्रण नहीं होता। उदाहरण — हृदय की पेशियाँ, फेफड़ों की पेशियाँ।
संरचना के आधार पर पेशीय ऊतकों के प्रकार:
| प्रकार | विशेषताएँ |
| 1. कंकाल पेशी / रेखित पेशी (Striated/Skeletal Muscle) | बंडलों में लंबी, बेलनाकार कोशिकाएँ; सरकोलिमा पाई जाती है; अनेक केंद्रक (परिधि की ओर स्थित); ऐच्छिक; हाथ-पैर में पाई जाती है; शीघ्र थक जाती है |
| 2. अरेखित पेशी / चिकनी पेशी (Smooth/Unstriated Muscle) | तंतु जैसी लंबी कोशिकाएँ; सरकोलिमा अनुपस्थित; एक केंद्रक (मध्य में स्थित); अनैच्छिक; कभी नहीं थकती; पाचन नली, रक्त-वाहिनियों व मूत्राशय में पाई जाती है |
| 3. हृदय पेशी (Cardiac Muscle) | रेखित किंतु अनैच्छिक; सरकोलिमा पाया जाता है; निरंतर कार्य करती है, कभी नहीं थकती; केवल हृदय में पाई जाती है |
4. तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) किसे कहते हैं ?
तंत्रिका ऊतक वह ऊतक है जिसका निर्माण तंत्रिका कोशिकाओं (Neuron) से होता है। ये कोशिकाएँ शरीर में तंत्रिका आवेगों (Nerve Impulses) को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का कार्य करती हैं।
एक न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिका) के प्रमुख भाग:
- साइटन (Cyton / Cell Body): तारे जैसी संरचना; मध्य में बड़ा व स्पष्ट केन्द्रक; इसी भाग में कोशिका-द्रव्य व अन्य कोशिकांग उपस्थित होते हैं।
- डेंड्रॉन (Dendron): साइटन के बाहरी हिस्से से निकलने वाले भुजा-नुमा प्रवर्ध; अन्य तंत्रिकाओं से संकेत (Signal) ग्रहण करने में मदद करते हैं।
- डेंड्राइट (Dendrite): डेंड्रॉन से निकलने वाली पतली, शाखित संरचनाएँ; तंत्रिका आवेगों को साइटन तक पहुँचाती हैं।
- एक्सॉन (Axon): साइटन से निकलने वाला लंबा प्रवर्ध (तंत्रिकाक्ष); तंत्रिका आवेगों को साइटन से दूर, अन्य न्यूरॉन, पेशी या ग्रंथि तक पहुँचाता है।
- सिनेप्स (Synapse): दो तंत्रिका कोशिकाओं के डेंड्राइट्स या एक्सॉन के संपर्क-बिंदु; यहीं एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक आवेग पहुँचता है।
- माइलिन शीथ (Myelin Sheath): एक्सॉन के चारों ओर दोहरी झिल्ली से घिरी परत; एक्सॉन की रक्षा करती है और आवेगों की गति बढ़ाती है। इस पर कुछ स्थान खुले रहते हैं, जिन्हें रैन्वियर के नोड (Nodes of Ranvier) कहते हैं — ये आवेग के तीव्र संचार (Fast Conduction) में सहायक होते हैं।
तंत्रिका कोशिका के प्रकार:
संयोजक तंत्रिका कोशिका (Association / Interneuron): केवल मस्तिष्क और मेरुरज्जु में पाई जाती हैं; संवेदी व प्रेरक तंत्रिका कोशिकाओं को आपस में जोड़ती हैं — इन्हें नाड़ी तंत्र का “लिंक” भी कहा जाता है।
संवेदी या अभिवाही तंत्रिका कोशिका (Sensory / Afferent Neuron): संवेदी अंगों (त्वचा, जीभ, आँख आदि) को मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु से जोड़ती हैं; संवेदना को मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं।
प्रेरक या अपवाही तंत्रिका कोशिका (Motor / Efferent Neuron): मस्तिष्क या मेरुरज्जु से प्राप्त आदेशों (Impulses) को पेशीय ऊतक या ग्रंथियों तक पहुँचाती हैं — इन्हीं के कारण मांसपेशियाँ सिकुड़ती, फैलती या कार्य करती हैं।
Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi
निष्कर्ष (Conclusion):
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